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JAYADEVA ASHTAPADI

ध्यान श्लोकम् 

यद्गोपी वदनेन्दु मण्डनमभूत् कस्तूरिका पत्रकं

यल्लक्ष्मी कुच शातकुंभ कलशे व्याकोशमिन्दीवरम् ।

यन्निर्वाण विधान साधन विधौ सिद्धाञ्जनं योगिनां

तन्नः श्यामळमाविरस्तु हृदये कृष्णाभिधानं महः ॥ (१)

 

.. श्री जयदेव ध्यानम् ..

राधा मनोरम रमावर रासलीला

गानामृतैक भणितिं कविराज राजम् ।

श्री माधवार्चनविधौ अनुरागसद्म-

पद्मावती प्रियतमं प्रणतोस्मि नित्यम् ॥ (२)

 

श्रीगोपाल विलासिनी वलयसद्रत्नाति मुग्धाकृति

श्रीराधापति पादपद्म भजनानन्दाब्धि मग्नोऽनिशम् ..

लोके सत्कविराज राज इति यः ख्यातो दयाम्भो निधिः

तं वन्दे जयदेव सद्गुरुमहं पद्मावती वल्लभम् .. ३..

 

(महाकवि वेङ्कटसुब्बय्यर् विरचित्ं)

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पद्मावती रमणम् जयदेव कविराज भोजदेव सुत

पद्मपाद स्मरणम्

 

यद् गोपी वदनेन्दु मंडल रमितम्

तद् गोविन्द पद चन्द्र चकोरम्

 

किन्दु बिल्व सदनम् अति अति

दिव्य मंगल वदनम्

सुन्दरांग शुभ शोभित मदनम्

सुमुखी रमादेवी प्रियकर सुधनम्

 

सहपण्डित समूह सेव्यम्

शत मन्मथ जित महनीयम्

सतत कृष्ण प्रेमरसमग्न

समान रहित गीत गोविन्द काव्यम्

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Jayadevadhyanam
Shadow on Concrete Wall
01
Marble Surface
Pralaya Payodhijale 
Shadow on Concrete Wall
Raga : Saurashtram
Marble Surface
Taala : Adi
JDA_01-S

मेघैर्मेदुरमम्बरं वनभुवः श्यामास्तमाल द्रुमैः

नक्तं भीरुरयं त्वमेव तदिमं राधे गृहं प्रापय ।

इत्थं नन्द निदेशतश्चलितयोः प्रत्यध्व कुञ्जद्रुमं

राधा माधवयोर्जयन्ति यमुनाकूले रहः केळयः ॥ (१)

 

वाग्देवता चरित चित्रित चित्तसद्मा

पद्मावती चरण चारण चक्रवर्ती ।

श्रीवासुदेव रति केळि कथासमेतं

एतं करोति जयदेवकविः प्रबन्धम् ॥ (२)

 

 

यदि हरिस्मरणे सरसं मनो

यदि विलास कलासु कुतूहलम् ।

मधुर कोमळ कान्त पदावलिं

शृणु तदा जयदेव सरस्वतीम् ॥ (३)

 

वाचः पल्लवयत्युमापतिधरः सन्दर्भ शुद्धिं गिरां

जानीते जयदेव एव शरणः श्लाघ्यो दुरूहद्रुते ।

शृङ्गारोत्तर सत्प्रमेय रचनैः आचार्यगोवर्धनः

स्पर्धी कोऽपि न विश्रुतः श्रुतिधरो द्योयी कविक्ष्मापतिः ॥ (४)

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प्रळय पयोधि जले धृतवानसि वेदम् ।

विहित वहित्र चरित्रमखेदम् ॥

केशव धृत मीनशरीर जय जगदीश हरे ॥ १

क्षितिरति विपुलतरे तव तिष्ठति पृष्ठे ।

धरणि धरण किण चक्र गरिष्ठे ॥

केशव धृत कच्छपरूप जय जगदीश हरे .. २..

वसति दशन शिखरे धरणी तव लग्ना

शशिनि कळङ्क कळेव निमग्ना

केशव धृत सूकर रूप जय जगदीश हरे .. ३..

तव कर कमलवरे नखमद्भुत शृङ्गम् .

दळित हिरण्यकशिपु तनु भृङ्गम् ..

केशव धृत नरहरि रूप जय जगदीश हरे .. ४..

छलयसि विक्रमणे बलिमद्भुत वामन .

पद नख नीर जनित जन पावन ..

केशव धृत वामन रूप जय जगदीश हरे .. ५..

क्षत्रिय रुधिर मये जगदपगत पापम् .

स्नपयसि पयसि शमित भव तापम् ..

केशव धृत भृगुपति रूप जय जगदीश हरे .. ६..

वितरसि दिक्षु रणे दिक्पति कमनीयम् .

दशमुख मौळि बलिं रमणीयं ..

केशव धृत (राम शरीर)(रघुपति रूप) जय जगदीश हरे .. ७..

वहसि वपुषि विशदे वसनं जलदाभम्

हल हति भीति मिळित यमुनाभम्

केशव धृत हलधर रूप जय जगदीश हरे ८..

निन्द(ति)/(सि) यज्ञविधेः अहह श्रुति जातम् .

सदय हृदय दर्शित पशु घातम् ..

केशव धृत बुद्ध शरीर जय जगदीश हरे .. ९..

म्लेच्छ निवह निधने कलयसि करवाळम् .

धूमकेतुमिव किमपि कराळम् ..

केशव धृत कल्कि शरीर जय जगदीश हरे .. १०..

श्री जयदेव कवेः इदमुदितमुदारम् .

शृणु सुखदं शुभदं भव सारम् ..

केशव धृत दशविध रूप जय जगदीश हरे .. ११..

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02
Marble Surface
Shrithakamalakucha
Shadow on Concrete Wall
Raga : Bhairavi
Marble Surface
Taala : Adi
JDA_02-S

वेदानुद्धरते जग (न्ति)/(न्नि) वहते भूगोलमुद्बिभ्रते

दैत्यं दारयते बलिं छलयते क्षत्रक्षयं कुर्वते .

पौलस्त्यं जयते हलं कलयते कारुण्यमातन्वते

म्लेच्छान् मूर्च्छयते दशाकृतिकृते कृष्णाय तुभ्यं नमः .. ५..

श्रित कमला कुच मण्डल धृत कुण्डल

कलित ललित वनमाल जय जयदेव हरे १..

दिन मणि मण्डल मण्डन भव खण्डन

मुनिजन मानस हंस जय जयदेव हरे .. २..

 

कालिय विषधर भञ्जन जन रञ्जन

यदुकुल नळिन दिनेश जय जयदेव हरे .. ३..

मधुमुर नरक विनाशन गरुडासन

सुरकुल केळि निदान जय जयदेव हरे .. ४..

 

अमल कमल दळ लोचन भवमोचन

त्रिभुवन भवन निधान जय जयदेव हरे .. ५..

 

जनकसुता (कुच)/(कृत) भूषण जितदूषण

समर शमित दशकण्ठ जय जयदेव हरे .. ६..

 

अभिनव जलधर सुन्दर धृत मन्दर

श्रीमुख चन्द्र चकोर जय जयदेव हरे .. ७..

 

तवचरणे प्रणतावयमिति भावय ए ।

कुरुकुशलम् प्रणतेषु जय जय देव हरे

श्रीजयदेव कवेरिदं कुरुते मुदम्

मङ्गलमुज्ज्वल गीतम् जय जयदेव हरे .. ८..

 

पद्मा पयोधर तटी परिरम्भ लग्न

काश्मीर मुद्रितमुरो मधुसूदनस्य ।

व्यक्तानुरागमिव खेलदनङ्गखेद

स्वेदाम्बुपूरं अनुपूरयतु प्रियं वः ॥ ६..

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03
Marble Surface
Lalithalavanga
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Raga : Vasantha
Marble Surface
Taala : Adi
JDA_03-S

वसन्ते वासन्ती कुसुम सुकुमारैः अवयवैः

भ्रमन्तीं कान्तारे बहुविहित कृष्णानुसरणाम् ।

 

अमन्दं कन्दर्प ज्वर जनित चिन्ताकुलतया

वलद्बाधां राधां सरसमिदं ऊचे सहचरी ॥ ७..

ललित लवङ्ग लता परिशीलन कोमळ मलय समीरे ।

मधुकर निकर करम्बित कोकिल कूजित कुञ्ज कुटीरे ॥

विहरति हरिरिह सरसवसन्ते

नृत्यति युवति जनेन समं सखि विरहि जनस्य दुरन्ते ॥ (राधे) १..

 

उन्मद मदन मनोरथ पथिक वधूजन जनित विलापे ।

अळिकुल सङ्कुल कुसुम समूह निराकुल वकुळ कलापे ॥ (राधे) २..

मृगमद सौरभ रभस वशंवद नवदळ माल तमाले ।

युवजन हृदय विदारण मनसिज नखरुचि किंशुक जाले ॥ (राधे) ३..

 

मदन महीपति कनक दण्ड रुचि केसर कुसुम विकासे ।

मिळित शिलीमुख पाटल पटल कृतस्मर तूण विलासे ॥ (राधे) ४..

 

विगळित लज्जित जगदवलोकन तरुण करुण कृत हासे ।

विरहि निकृन्तन कुन्तमुखाकृति केतकि दन्तुरिताशे ॥ (राधे) ५..

 

माधविका परिमळ मिळिते नव मालिकयाति सुगन्धौ ।

मुनिमनसामपि मोहनकारिणि तरुणाकारण बन्धौ ॥ (राधे) ६..

 

स्फुरदति मुक्त लता परिरम्भण मुकुळित पुळकित चूते ।

बृन्दावन विपिने परिसर परिगत यमुनाजलपूते ॥ (राधे) ७..

 

श्रीजयदेव भणितमिदमुदयति हरिचरण स्मृति सारम् ।

सरस वसन्त समय वन वर्णनं अनुगत मदन विकारम् ॥ (राधे) ८..

 

दर विदळित मल्ली वल्लि चञ्चत्पराग-

प्रकटित पटवासैः वासयन् काननानि ।

 

इह हि दहति चेतः केतकी गन्ध बन्धुः

प्रसरदसम बाण प्राणवत् गन्धवाहः ॥ ८..

 

उन्मीलन्मधु गन्ध लुब्ध मधुप व्याधूत चूताङ्कुर-

क्रीडत् कोकिल काकली कलकलैः उद्गीर्ण कर्णज्वराः ।

नीयन्ते पथिकैः कथं कथमपि ध्यानावधान क्षण-

प्राप्त प्राण समा समागम रसोल्लासैः अमी वासराः ॥ ९..

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04
Marble Surface
Chandanacharchitha
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Raga : Panthuvarali
Marble Surface
Taala : Adi
JDA_04-S

अनेक नारी परिरम्भ सम्भ्रम-

स्फुरन्मनोहारि विलास लालसम् ।

मुरारिमारात् उपदर्शयन्त्यसौ

सखी समक्षं पुनराह राधिकाम् १०..

चन्दन चर्चित नील कलेबर पीत वसन वनमाली ।

केळि चलन्मणि कुण्डल मण्डित गण्डयुग स्मित शाली ॥

हरिरिह मुग्ध वधू निकरे

विलासिनि विलसति केळि परे ॥ (राधे) १..

 

पीन पयोधर भार भरेण हरिं परिरभ्य सरागम् ।

गोपवधूरनु गायति काचिदुदञ्चित पञ्चम रागम् ॥ २..

 

काऽपि विलास विलोल विलोचन खेलन जनित मनोजम् ।

ध्यायति मुग्ध वधूरधिकं मधुसूदन वदन सरोजम् ॥ (राधे) ३..

काऽपि कपोल तले मिलिता लपितुं किमपि श्रुतिमूले ।

चारु चुचुम्ब नितम्बवती दयितं पुलकैरनुकूले ॥ (राधे) ४..

 

केळिकला कुतुकेन च काचिदमुं यमुनावन कूले ।

मञ्जुळ वञ्जुळ कुञ्जगतं विचकर्ष करेण दुकूले ॥ (राधे) ५..

 

करतल ताळ तरळ वलयावलि कलित कलस्वन वंशे ।

रास रसे सह नृत्यपरा हरिणा युवतिः प्रशशंसे ॥ (राधे) ६..

 

श्लिष्यति कामपि चुम्बति कामपि कामपि रमयति रामाम् ।

पश्यति सस्मित चारुतरां अपरामनु गच्छति वामाम् ॥ (राधे) ७..

 

श्री जयदेव भणितमिदं अद्भुत केशव केळि रहस्यम् ।

बृन्दावन विपिने चरितं वितनोतु शुभानि यशस्यम् ॥ (राधे) ८..

विश्वेषां अनुरञ्जनेन जनयन् आनन्दमिन्दीवर-

श्रेणी श्यामळ कोमळैरुपनयन् अङ्गैः अनङ्गोत्सवम् ।

स्वच्छन्दं व्रजसुन्दरीभिरभितः प्रत्यङ्गमालिङ्कितः

शृङ्गारः सखि मूर्तिमानिव मधौ मुग्धो हरिः क्रीडति ॥ ११..

 

अद्योत्सङ्ग वसद्भुजङ्ग कबल क्लेशादिवेशाचलं

प्रालेय प्लवनेच्छयानुसरति श्रीखण्ड शैलानिलः ।

किञ्चित् स्निग्ध रसाल मौलि मुकुलान्यालोक्य हर्षोदयात्

उन्मीलन्ति कुहूः कुहूरिति कलोत्ताळाः पिकानां गिरः ॥ १२..

 

रासोल्लास भरेण विभ्रम भृतां आभीरवामभ्रुवां

अभ्यर्णं परिरम्य निर्भर मुरः प्रेमान्धया राधया ।

साधु त्वद्वदनं सुधामयमिति व्याहृत्य गीतस्तुति

व्याजादुद्भट चुम्बित स्मितमनोहारी हरिः पातु वः ॥ १३..

 

इति श्रीगीतगोविन्दे शृङ्गार महाकाव्ये

श्रीकृष्णदास जयदेवकृतौ सामोद दामोदरो नाम

प्रथमः सर्गः ॥

Shadow on Concrete Wall
05
Marble Surface
Sanchara Adharasudha
Shadow on Concrete Wall
Raga : Thodi
Marble Surface
Taala : Adi
JDA_05-S

विहरति वने राधा साधारण प्रणये हरौ

विगळित निजोत्कर्षात ईर्ष्यावशेन गतान्यतः ।

क्वचिदपि लताकुञ्जे गुञ्जन् मधुव्रत मण्डली

मुखर शिखरे लीना दीनाप्युवाच रहस्सखीम् .. १४..

संचरदधर सुधा मधुरध्वनि मुखरित मोहन वंशम् ।

चलित दृगञ्चल चञ्चल मौळि कपोल विलोल वतंसम् ॥

रासे हरिमिह विहित विलासं

स्मरति मनो मम कृत परिहासम् ॥ १..

चन्द्रक चारु मयूर शिखण्डक मण्डल वलयित केशम् ।

प्रचुर पुरन्दर धनुरनु रञ्जित मेदुर मुदिर सुवेषम् । २..

गोप कदम्ब नितम्बवती मुख चुम्बन लम्बित लोभम् ।

बन्धु जीव मधुराधर पल्लव कलित दर स्मित शोभम् ॥ ३..

 

विपुल पुलक भुज पल्लव वलयित वल्लव युवति सहस्रम् ।

कर चरणोरसि मणिगण भूषण किरण विभिन्न तमिस्रम् ॥ ४..

 

जलद पटल चलदिन्दु विनिन्दक चन्दन बिन्दु ललाटम् ।

पीन पयोधर परिसर मर्दन निर्दय हृदय कवाटम् ॥ ५..

 

मणिमय मकर मनोहर कुण्डल मण्डित गण्डमुदारम् ।

पीतवसनमनुगत मुनिमनुज सुरासुर वर परिवारम् ॥ ६..

 

विशद कदम्ब तले मिळितं कलिकलुष भयं शमयन्तम् ।

मामपि किमपि तरङ्गदनङ्ग दृशा वपुषा रमयन्तम् ॥ ७..

 

श्रीजयदेव भणितमति सुन्दर मोहन मधुरिपु रूपम् ।

हरि चरण स्मरणं प्रति संप्रति पुण्यवतां अनुरूपम् ॥ ८..

Shadow on Concrete Wall
06
Marble Surface
Nibhrutha nikunja
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Raga : Kamboji
Marble Surface
Taala : Adi
JDA_06-S

गणयति गुणग्रामं भ्रामं भ्रमादपि नेहते

वहति च परितोषं दोषं विमुञ्चति दूरतः ।

युवतिषु वलत्तृष्णे कृष्णे विहारिणि मां विना

पुनरपि मनो वामं कामं करोति करोमि किम् ॥ १५..

निभृत निकुञ्ज गृहं गतया निशि रहसि निलीय वसन्तम् ।

चकित विलोकित सकल दिशा रति रभस वशेन हसन्तम् ॥

(कृष्णं) सखि हे केशि मथनमुदारम्

रमय मया सह मदन मनोरथ भावितया सविकारम् ॥ (कृष्णं) ॥ १..

प्रथम समागम लज्जितया पटु चाटु शतैरनुकूलम् ।

मृदु मधुर स्मित भाषितया शिथिलीकृत जधन दुकूलम् ॥ (कृष्णम्) २.

 

किसलय शयन निवेशितया चिरं उरसि ममैव शयानम् ।

कृत परिरम्भण चुम्बनया परिरभ्य कृताधर पानम् ॥ (कृष्णम्) ३..

 

अलस निमीलित लोचनया पुळकावलि ललित कपोलम् ।

श्रमजल सकल कलेबरया वर मदन मदादति लोलम् ॥ (कृष्णम्) ४..

 

कोकिल कलरव कूजितया जित मनसिज तन्त्र विचारम् ।

श्लथ कुसुमाकुल कुन्तलया नख लिखित घन स्तन भारम् ॥ (कृष्णम्) ५..

 

चरण रणित मणि नूपुरया परिपूरित सुरत वितानम् ।

मुखर विशृङ्खल मेखलया सकच ग्रह चुम्बन दानम् ॥ (कृष्णम्) ६..

 

रति सुख समय रसालसया दर मुकुळित नयन सरोजम् ।

निस्सह निपतित तनुलतया मधुसूदनमुदित मनोजम् ॥ (कृष्णम्) ७..

 

श्रीजयदेव भणितमिदमतिशय मधुरिपु निधुवन शीलम् ।

सुखमुत्कण्ठित राधिकया कथितं वितनोतु सलीलम् ॥ (कृष्णम्) ८..

 

हस्त स्रस्त विलास वंशमनृजु भ्रूवल्ली मद्वल्लवी

वृन्दोत्साह दृगन्त वीक्षित मति स्वेदार्द्र गण्डस्थलम् ।

मामुद्वीक्ष्य विलक्षित स्मित सुधा मुग्धाननं कानने

गोविन्दं व्रजसुन्दरी गणवृतं पश्यामि हृष्यामि च ॥ १६..

 

दुरालोक स्तोक स्तबक नवकाशोक लतिका

विकासः कासारो पवन पवनोऽयं व्यथयति ।

अपि भ्राम्यत् भृङ्गीरणित रमणीयान मुकुळ

प्रसूतिः चूतानां सखि शिखरिणीयं सुखयति ॥ १७..

 

साकूत स्मितमाकुलाकुलगलद्धम्मिल्लमुल्लासित

भ्रूवल्लीकमळीक दर्शित भुजा मूलार्द्ध दृष्टस्तनम्।

गोपीनां निभृतं निरीक्ष्य गमिता कांक्षः चिरं चिन्तयन्-

अन्तर्मुग्ध मनोहरं हरतु वः क्लेशं नवः केशवः॥

 

इति गीतगोविन्दे शृङ्गार महाकाव्ये

श्रीकृष्णदास जयदेवकृतौ अक्लेशकेशवो नाम

द्वितीयः सर्गः

Shadow on Concrete Wall
07
Marble Surface
Mamiyam Chalitha
Shadow on Concrete Wall
Raga : Bhoopalam
Marble Surface
Taala : Adi
JDA_07-S

कंसारिरपि संसार वासना बद्ध शृङ्खलाम् ।

राधामाधाय हृदये तत्याज व्रजसुन्दरीः ॥ १८..

इतस्ततस्तां अनुसृत्य राधिकां

अनङ्ग बाण व्रण खिन्न मानसः ।

कृतानुतापः स कळिन्द नन्दिनी

तटान्त कुञ्जे विषसाद माधवः ॥ १९..

मामियं चलिता विलोक्य वृतं वधूनिचयेन ।

सापराधतया मयाऽपि न वारिताऽतिभयेन ॥

हरिहरि हतादरतया ।

सा गता कुपितेव हरिहरि ॥ १..

 

किं करिष्यति किं वदिष्यति सा चिरं विरहेण ।

किं धनेन जनेन किं मम (जीवितेन)(भूषणेन) गृहेण ॥ २..

 

चिन्तयामि तदाननं कुटिलभ्रु कोपभरेण ।

शोणपद्ममिवोपरि भ्रमताऽऽकुलं भ्रमरेण ॥ ३..

तामहं हृदि संगतां अनिशं भृशं रमयामि ।

किं वनेऽनुसरामि तामिह किं वृथा विलपामि ॥ ४..

 

तन्वि खिन्नमसूयया हृदयं तवाकलयामि ।

तन्न वेद्मि कुतो गताऽसि न तेन तेऽनुनयामि ॥ ५..

 

दृश्यसे पुरतो गतागतं एव मे विदधासि ।

किं पुरेव ससंभ्रमं परिरम्भणं न ददासि ॥ ६..

क्षम्यतामपरं कदापि तवेदृशं न करोमि ।

देहि सुन्दरि दर्शनं मम मन्मथेन दुनोमि ॥ ७..

वर्णितं जयदेवकेन हरेरिदं प्रवणेन ।

(ति)/(कि) न्दुबिल्व समुद्र सम्भव रोहिणी रमणेन ॥ ८..

हृदि बिसलताहारो नायं भुजङ्गमनायकः

कुवलयदळ श्रेणी कण्ठे न सा गरलद्युतिः ।

मलयजरजो नेदं भस्म प्रियारहिते मयि

प्रहर न हर भ्रान्त्याऽनङ्ग क्रुधा किमु धावसि ॥ २०..

पाणौ मा कुरु चूतसायकममुं मा चापमारोपय

क्रीडा निर्जित विश्व मूर्छित जनाघातेन किं पौरुषम् ।

तस्या एव मृगीदृशो मनसिज प्रेङ्खत् कटाक्षाशुग-

श्रेणी जर्झरितं मनागपि मनो नाद्यापि संधुक्षते ॥ २१..

 

भ्रूपल्लवं धनुरपाङ्ग तरङ्गितानि

बाणाः गुणः श्रवणपालिरिति स्मरेण ।

तस्यामनङ्ग जय जङ्गम देवतायां

अस्त्राणि निर्जित जगन्ति किमर्पितानि ॥ २४..

भ्रूचापे निहितः कटाक्षविशिखो निर्मातु मर्मव्यथां

श्यामात्मा कुटिलः करोतु कबरी भारोऽपि मारोद्यमम् ।

मोहं तावदयं च तन्वि तनुतां बिम्बाधरो रागवान्

सद्वृत्तः स्तनमण्डलस्तव कथं प्राणैर्मम क्रीडति ॥ २२..

तानि स्पर्शसुखानि ते च सरलाः स्निग्धा दृशोर्विभ्रमाः

तद्वक्त्राम्बुज सौरभं स च सुधा स्यन्दी गिरां वक्रिमा ।

सा बिम्बाधर माधुरीति विषया सङ्गेऽपि चेन्मानसं

तस्यां लग्नसमाधि हन्त विरहव्याधिः कथं वर्धते ॥ २३..

 

तिर्यक्कंठ विलोल मौळि तरळोत्तंसस्य वंशोच्चरत्

गीत स्थान कृतावधान ललना लक्षैर्न संलक्षिताः ।

सम्मुग्धं मधुसूदनस्य मधुरे राधामुखेन्दौ मृदु

स्यन्दं कन्दलिताः चिरं ददतु वः क्षेमं कटाक्षोर्मयः॥६॥

इति श्रीगीतगोविन्दे शृङ्गार महाकाव्ये

श्रीकृष्णदास जयदेवकृतौ

मुग्धमधुसूदनो नाम तृतीयस्सर्गः ॥

Shadow on Concrete Wall
08
Marble Surface
Nindathi Chandana
Shadow on Concrete Wall
Raga : Kanada
Marble Surface
Taala : Adi
JDA_08-S

यमुना तीर वानीर निकुञ्जे मन्दमास्थितम् |

प्राह प्रेमभरोद्भ्रान्तं माधवं राधिकासखी || २५..

निन्दति चन्दनं इन्दुकिरणं अनु विन्दति खेदमधीरम् ।

व्याळनिलय मिळनेन गरळमिव कलयति मलय समीरम् ॥

 

सा विरहे तव दीना ।

माधव मनसिज विशिख भयादिव भावनया त्वयि लीना ॥ (कृष्णा) १..

 

अविरळ निपतित मदन शरादिव भवदवनाय विशालम् ।

स्वहृदय मर्मणि वर्म करोति सजल नळिनी दळ जालम् ॥ (कृष्णा) २..

 

कुसुम विशिख शर तल्पमनल्प विलास कला कमनीयम् ।

व्रतमिव तव परिरम्भ सुखाय करोति कुसुम शयनीयम् ॥ (कृष्णा) ३..

 

वहति च गळित विलोचन जल(भरं)/(धरं) आननकमलमुदारम् ।

विधुमिव विकट विधुन्तुद दन्त दळन गलितामृत धारम् ॥ (कृष्णा) ४..

 

विलिखति रहसि कुरङ्गमदेन भवन्तमसम शर भूतम् ।

प्रणमति मकरमधो विनिधाय करे च शरं नवचूतम् ॥ (कृष्णा) ५..

 

प्रतिपदमिदमपि निगदति माधव तव चरणे पतिताहम् ।

त्वयि विमुखे मयि सपदि सुधानिधिरपि तनुते तनुदाहम् ॥ (कृष्णा) ६..

 

ध्यानलयेन पुरः परिकल्प्य भवन्तमतीव दुरापम् ।

विलपति हसति विषीदति रोदिति चञ्चति मुञ्चति तापम् ॥ (कृष्णा) ७..

श्रीजयदेव भणित मिदमधिकं यदि मनसा नटनीयम् ।

हरि विरहाकुल वल्लव युवति सखी वचनं पठनीयम् ॥ (कृष्णा) ८..

Shadow on Concrete Wall
09
Marble Surface
Sthanavinihitham api
Shadow on Concrete Wall
Raga : Bilahari
Marble Surface
Taala : Adi
JDA_09-S

आवासो विपिनायते प्रियसखी मालापि जालायते

तापो निश्वसितेन दावदहन ज्वाला कलापायते ।

साऽपि त्वद्विरहेण हन्त हरिणी रूपायते हा कथं

कन्दर्पोऽपि यमायते विरचयन् शार्दूल विक्रीडितम् ॥ २६..

स्तन विनिहितमपि हारमुदारम् ।

सा मनुते कृश तनुरति भारम् ॥

 

राधिका कृष्ण राधिका ॥

राधिका विरहे तव केशव ॥ १..

 

सरस मसृणमपि मलयज पङ्कम् ।

पश्यति विषमिव वपुषि सशङ्कम् ॥ २..

श्वसित पवनं अनुपम परिणाहम् ।

मदन दहनमिव वहति सदाहम् ॥ ३..

दिशि दिशि किरति सजल कण जालम् .

नयन नळिनमिव विगळित नाळ्म् ॥ ४..

नयन विषयमपि किसलय तल्पम् ।

कलयति विहित हुताशन कल्पम् ॥ ५..

त्यजति न पाणि तलेन कपोलम् ।

बाल शशिनमिव सायमलोलम् ॥ ६..

हरिरिति हरिरिति जपति सकामम् ।

विरह विहित मरणेव निकामम् ॥ ७..

श्रीजयदेव भणितमिति गीतम् ।

सुखयतु केशवपदं उपनीतम् ॥ ८..

सा रोमाञ्चति सीत्करोति विलपति उत्कम्पते ताम्यति

ध्यायति उद्भ्रमति प्रमीलति पतति उद्याति मूर्च्छत्यपि ।

एतावत्यतनुज्वरे वरतनुः जीवेन्न किं ते रसात्

स्वर्वैद्य प्रतिम प्रसीदसि यदि त्यक्तोऽन्यथा हस्तकः ॥ २७..

स्मरातुरां दैवत वैद्य हृद्य

त्वदङ्ग सङ्गामृत मात्र साध्याम् ।

विमुक्त बाधां कुरुषे न राधां

उपेन्द्र वज्राधिक दारुणोऽसि ॥ २८..

कन्दर्पज्वर संज्वराकुलतनोः आश्चर्यमस्याश्चिरं

चेतश्चन्दन चन्द्रमः कमलिनी चिन्तासु संताम्यति ।

किंतु क्लान्तिवशेन शीतलतरं त्वामेकमेव (क्षणं)/(प्रियं)

ध्यायन्ती रहसि स्थिता कथमपि क्षीणा क्षणं प्राणिति॥ २९..

क्षणमपि विरहः पुरा न सेहे

नयन निमीलन खिन्नयाऽनया ते ।

श्वसिति कथमसौ रसाल शाखां

चिर विरहेण विलोक्य पुष्पिताग्राम् ॥ ३०..

वृष्टि व्याकुल गोकुलावन वशात् उद्धृत्य गोवर्धनम्

बिभ्रद्वल्लव वल्लभाभिः अधिकानन्दाश्चिरं चुम्बितः।

दर्पेणैव तदर्पिताधरतटी सिन्दूर मुद्राङ्कितो

बाहुर्गोपतनोः तनोतु भवतां श्रेयांसि कंसद्विषः ॥५॥

 

इति श्रीगीतगोविन्दे शृङ्गार महाकाव्ये

श्रीकृष्णदास जयदेवकृतौ

स्निग्धमधुसूधनो नाम चतुर्थः सर्गः ॥

Shadow on Concrete Wall
10
Marble Surface
Vahati Malaya samire
Shadow on Concrete Wall
Raga : Ananda Bhairavi
Marble Surface
Taala : Adi
JDA_10-S

अहमिह निवसामि याहि राधां

अनुनय मद्वचनेन च आनयेथाः |

इति मधुरिपुणा सखी नियुक्ता

स्वयमिदमेत्य पुनर्जगाद राधाम् || ३१..

 

.. गीतम् १०.. (आनन्दभैरवि)

वहति मलय समीरे (राधे)

मदनमुपनिधाय ।

स्फुटति कुसुमनिकरे (राधे) विरहि हृदय दळनाय ॥

 

तव विरहे वनमाली ॥

सखि सीदति राधे राधे ॥ (राधे) १..

दहति शिशिरमयूखे (राधे) मरणमनुकरोति ।

पतति मदनविशिखे (राधे) विलपति विकलतरोऽति ॥ (राधे) २..

ध्वनति मधुप समूहे (राधे)

श्रवणमपिदधाति ।

मनसि चलित विरहे (राधे) निशि निशि रुजमुपयाति ॥ (राधे) ३..

 

वसति विपिन विताने (राधे)

त्यजति ललितधाम ।

लुठति धरणिशयने (राधे) बहु विलपति तव नाम ॥ (राधे) ४..

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11
Marble Surface
RatiSukha Saare
Shadow on Concrete Wall
Raga : Kedara Gowla
Marble Surface
Taala : Adi
JDA_11-S

पूर्वं यत्र समं त्वया रतिपतेः आराधिताः सिद्धयः

तस्मिन्नेव निकुञ्ज मन्मथ महातीर्थे पुनर्माधवः ।

ध्यायंस्त्वां अनिशं जपन्नपि तवैव आलाप मन्त्रावलिं

भूयः त्वत्कुचकुम्भ निर्भर परी रम्भामृतं वाञ्छति ॥ ३२..

रतिसुखसारे गतमभिसारे मदन मनोहर वेषम् ।

न कुरु नितम्बिनि गमन विलम्बनं अनुसर तं हृदयेशम् ॥

 

धीर समीरे यमुनातीरे वसति वने वनमाली ।

गोपी पीनपयोधर मर्दन चञ्चल कर युगशाली ॥ (राधे) १..

 

नाम समेतं कृतसङ्केतं वादयते मृदुवेणुम् ।

बहु मनुते ननु ते तनुसङ्गत पवन चलितमपि रेणुम् ॥ (राधे) २..

पतति पतत्रे विचलति पत्रे शङ्कित भवदुपयानम् ।

रचयति शयनं सचकित नयनं पश्यति तव पन्थानम् ॥ (राधे) ३..

 

मुखरमधीरं त्यज मञ्जीरं रिपुमिव केळिषु लोलम् ।

चल सखि कुञ्जं सतिमिर पुञ्जं शीलय नील निचोळम् । (राधे) ४..

उरसि मुरारेः उपहितहारे घन इव तरळ बलाके ।

तटिदिव पीते रति विपरीते राजसि सुकृत विपाके ॥ (राधे) ५..

विगलित वसनं परिहृत रशनं घटय जघनमपि धानम् ।

किसलय शयने पङ्कज नयने निधिमिव हर्ष निदानम् ॥ (राधे) ६..

हरिरभिमानी रजनिरिदानीं इयमुपयाति विरामम् ।

कुरु मम वचनं सत्वर रचनं पूरय मधुरिपु कामम् ॥ (राधे) ७..

श्रीजयदेवे कृत हरिसेवे भणति परम रमणीयम् ।

प्रमुदित हृदयं हरिमति सदयं नमत सुकृत कमनीयम् ॥ (राधे) ८..

विकिरति मुहुः श्वासानाशाः पुरो मुहुरीक्षते

प्रविशति मुहुः कुञ्जं गुञ्जन् मुहुः बहुताम्यति ।

रचयति मुहुः शय्यां पर्याकुलं मुहुरीक्षते

मदन कदन क्लान्तः कान्ते प्रियस्तव वर्तते ॥ ३३..

त्वद्वाक्येन समं समग्रमधुना तिग्मांशुरस्तङ्गतो

गोविन्दस्य मनोरथेन च समं प्राप्तं तमस्सान्द्रताम् ।

कोकानां करुणस्वनेन सदृशी दीर्घा मदभ्यर्थना

तन्मुग्धे विफलं विलम्बनमसौ रम्योऽभिसारक्षणः ॥ ३४..

आश्लेषादनु चुम्बनादनु नखोल्लेखादनु स्वान्तज-

प्रोद्बोधादनु संभ्रमादनु रतारम्भादनु प्रीतयोः ।

अन्यार्थं गतयोः भ्र्मान्मिळितयोः सम्भाषणैः जानतोः

दम्पत्योरिह को न को न तमसि व्रीडा विमिश्रो रसः ॥ ३५..

सभय चकितं विन्यस्यन्तीं दृशं तिमिरे पथि

प्रतितरु मुहुः स्थित्वा मन्दं पदानि वितन्वतीम् ।

कथमपि रहः प्राप्तां अङ्गैरनङ्गतरङ्गितैः

सुमुखि सुभगः पश्यन् सत्वामुपैतु कृतार्थताम् ॥ ३६..

राधा मुग्ध मुखारविन्द मधुपः त्रैलोक्यमौळिस्थली

नैपथ्योचित नीलरत्नमवनी भारावतारान्तकः ।

स्वच्छन्दं व्रजसुन्दरीजन मनस्तोष प्रदोषश्चिरं

कंस ध्वंसन धूमकेतुरवतु त्वां देवकीनन्दनः॥५॥

इति श्रीगीतगोविन्दे शृङ्गार महाकाव्ये

श्रीकृष्णदास जयदेवकृतौ अभिसारिका वर्णने

साकाङ्क्षपुण्डरीकाक्षो नाम पञ्चमः सर्गः ॥

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12
Marble Surface
Pashyathi Dishi Dishi
Shadow on Concrete Wall
Raga : Sankarabharanam
Marble Surface
Taala : Adi
JDA_12-S

अथ तां गन्तुमशक्तां चिरमनुरक्तां लतागृहे दृष्ट्वा ।

तच्चरितं गोविन्दे मनसिजमन्दे सखी प्राह ॥ ३७..

.

पश्यति दिशि दिशि रहसि भवन्तम् ।

त्वदधर मधुर मधूनि पिबन्तम् ॥

नाथ हरे जगन्नाथ हरे ।

सीदति राधा वासगृहे ॥ १..

 

त्वदभिसरण रभसेन वलन्ती ।

पतति पदानि कियन्ति चलन्ती ॥ (नाथ हरे) २..

विहित विशद बिस किसलय वलया ।

जीवति परमिह तव रति कलया ॥ (नाथ हरे) ३..

मुहुरवलोकित मण्डन लीला ।

मधुरिपुरहमिति भावन शीला ॥ (नाथ हरे) ४..

त्वरितमुपैति न कथमभिसारम् ।

हरिरिति वदति सखीमनुवारम् ॥ (नाथ हरे) ५..

श्लिष्यति चुम्बति जलधर कल्पम् ।

हरिरुपगत इति तिमिरमनल्पम् ॥ (नाथ हरे) ६..

भवति विळम्बिनि विगळितलज्जा ।

विलपति रोदिति वासक सज्जा ॥ (नाथ हरे) ७..

श्री जयदेव कवेरिदमुदितम् ।

रसिकजनं तनुतां अति मुदितम् ॥ (नाथ हरे) ८..

विपुल पुळक पाळिः स्फीतसीत्कारमन्तः

जनित जडिम काकु व्याकुलं व्याहरन्ती ।

तव कितव विधत्तेऽमन्द कन्दर्प चिन्तां

रस जलधि निमग्ना ध्यानलग्ना मृगाक्षी ॥ ३८..

अङ्गेष्वाभरणं करोति बहुशः पत्रेऽपि सञ्चारिणि

प्राप्तं त्वां परिशङ्कते वितनुते शय्यां चिरं ध्यायति ।

इत्याकल्प विकल्प तल्प रचना सङ्कल्प लीलाशत

व्यासक्तापि विना त्वया वरतनुर्नैषा निशां नेष्यति ॥ ३९..

किं विश्राम्यसि कृष्ण भोगि भवने भाण्डीर भूमीरुहि

भ्रातर्याहि न दृष्टिगोचरमितः सानन्दनन्दास्पदम्।

राधाया वचनं तदध्वगमुखात् नन्दान्तिके गोपतो

गोविन्दस्य जयन्ति सायमतिथि प्राशस्त्य गर्भा गिरः ॥३॥

इति श्रीगीतगोविन्दे शृङ्गार महाकाव्ये

श्रीकृष्णदास जयदेवकृतौ

(वासकसज्जावर्णने) सोत्कण्ठ वैकुण्ठो नाम

षष्टः सर्गः ॥

Shadow on Concrete Wall
13
Marble Surface
Kathitha Samaye 
Shadow on Concrete Wall
Raga : Ahiri
Marble Surface
Taala : Adi
JDA_13-S

अत्रान्तरे च कुलटा कुलवर्त्म(घात)/(पात)

सञ्जात पातक इव स्फुटलाञ्छन श्रीः ।

बृन्दावनान्तरं अदीपयत् अंशुजालैः

दिक्सुन्दरीवदनचन्दनबिन्दुरिन्दुः ॥ ४०..

प्रसरति शशधर बिम्बे विहित विलम्बे च माधवे विधुरा ।

विरचित विविध विलापं सा परितापं चकार उच्चैः ॥ ४१..

कथित समयेऽपि हरिः अहह न ययौ वनम् ।

मम विफलं इदममल रूपमपि यौवनम् ॥

 

यामि हे कमिह शरणम् ॥

सखी जन वचन वञ्चिताऽहम् ॥ १..

 

यदनुगमनाय निशि गहनमपि शीलितम् ।

तेन मम हृदयमिदं असमशर कीलितम् ॥ २..

मम मरणमेव वरं अतिवितथकेतना ।

किमिति विषहामि विरहानलं अचेतना ॥ ३..

अहह कलयामि वलयादि मणी भूषणम् ।

हरि विरह दहन वहनेन बहु दूषणम् ॥ ५..

मामिह हि विधुरयति मधुर मधु यामिनी ।

काऽपि हरिं अनुभवति कृतसुकृतकामिनी ॥ ४..

कुसुम सुकुमार तनुं असम शर लीलया ।

स्रगपि हृदि हन्ति मां अति विषम शीलया ॥ ६..

अहमिह विनिवसामि नविगणित वेतसा ।

स्मरति मधुसूदनो मामपि न चेतसा ॥ ७..

हरि चरण शरण जयदेव कवि भारती ।

वसतु हृदि युवतिरिव कोमळ कलावती ॥ ८..

तत्किं कामपि कामिनीं अभिसृतः किं वा कला केलिभिः

बद्धो बन्धुभिः अन्धकारिणि वनाभ्यर्णे किमु भ्राम्यति ।

कान्तः क्लान्तमना मनागपि पथि प्रस्थातुं एवाक्षमः

सङ्केती कृत मञ्जु वञ्जुळ लता कुञ्जेऽपि यन्नागतः ॥ ४२..

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14
Marble Surface
Smara Sama Rochitha
Shadow on Concrete Wall
Raga : Saaranga
Marble Surface
Taala : Adi
JDA_14-S

अथागतां माधवं अन्तरेण

सखीमियं वीक्ष्य विषाद मूकाम् ।

विशङ्क्माना रमितं कयाऽपि

जनार्दनं दृष्टवत् एतदाह ॥ ४३..

स्मर समरोचित विरचित वेषा ।

गळित कुसुमभर विलुळित केशा ॥

 

कापि मधुरिपुणा

विलसति युवतिः अधिकगुणा ॥ १..

हरि परिरम्भण फलित विकारा ।

कुच कलशोपरि तरळित हारा ॥ २..

विचल दळक ललितानन चन्द्रा ।

तदधर पानर भस कृत तन्द्रा ॥ ३..

चञ्चल कुण्डल ललित कपोला ।

मुखरित रशन जघन गति लोला ॥ ४..

दयित विलोकित लज्जित हसिता ।

बहुविध कूजित रतिरस रसिता ॥ ५..

विपुल पुलक पृथु वेपथु भङ्गा ।

श्वसित निमीलित विकसत् अनङ्गा ॥ ६..

श्रमजल कणभर सुभग शरीरा ।

परिपतितोरसि रतिरण धीरा ॥ ७..

श्री जयदेव भणित हरि रमितम् ।

कलिकलुषं जनयतु परि शमितम् ॥ ८..

Shadow on Concrete Wall
15
Marble Surface
Samuditha Madane
Shadow on Concrete Wall
Raga : Saveri
Marble Surface
Taala : Adi
JDA_15-S

विरह पाण्डु मुरारि मुखाम्बुज

ध्युतिरयं तिरयन्नपि वेदनाम् ।

विधुरतीव तनोति मनोभुवः

सुहृत् अये हृदये मदन व्यथाम् ॥ ४४..

समुदित मदने रमणी वदने चुम्बन चलिताधरे । (अये सखि)

मृगमदतिलकं लिखति सपुलकं मृगमिव रजनीकरे ॥ (गोपालो)

 

रमते यमुनापुलिनवने ।

विजयी मुरारिः अधुना ॥ (गोपालो) १..

घनचय रुचिरे रचयति चिकुरे तरळित तरुणानने । (अये सखि)

कुरवक कुसुमं चपला सुषमं रतिपति मृगकानने ॥ (गोपालो) २..

घटयति सुघने कुचयुग गगने मृगमद रुचिरूषिते । (अये सखि)

मणिसरं अमलं तारक पटलं नख पद शशि भूषिते ॥ (गोपालो) ३..

जित बिस शकले मृदुभुज युगले करतल नलिनीदळे । (अये सखि)

मरकत वलयं मधुकर निचयं वितरति हिमशीतळे ॥ (गोपालो) ४..

रतिगृह जघने विपुलापघने मनसिज कनकासने । (अये सखि)

मणिमय रशनं तोरण हसनं विकिरति कृत वासने ॥ (गोपालो) ५..

चरण किसलये कमला निलये नख मणि गण पूजिते । (अये सखि)

बहिरप वरणं यावक भरणं जनयति हृदि योजिते ॥ (गोपालो) ६..

ध्यायति सदृशं कामपि सुदृशं खल हलधर सोदरे । (अये सखि)

किमफलमवसं चिरमिह विरसं वद सखि विटपोदरे ॥ (गोपालो) ७..

इह रस भणने कृत हरि गुणने मधुरिपु पद सेवके । (अये सखि)

कलियुग चरितं न वसतु दुरितं कवि नृप जयदेवके ॥ (गोपालो) ८..

Shadow on Concrete Wall
16
Marble Surface
Anila Tarala Kuvalaya
Shadow on Concrete Wall
Raga : Punagavarali
Marble Surface
Taala : Adi
JDA_16-S

नायातः सखि निर्दयो यदि शठः त्वं दूति किं दूयसे

स्वच्छन्दं बहुवल्लभः स रमते किं तत्र ते दूषणम् ।

पश्याद्य प्रियसङ्गमाय दयितस्य आकृष्यमाणं गुणैः

उत्कण्ठार्ति भरादिव स्फुटमिदं चेतः स्वयं यास्यति ॥ ४५..

अनिल तरळ कुवलय नयनेन ।

तपति न सा किसलयशयनेन ॥

 

या रमिता वनमालिना सखि

या रमिता वनमालिना ॥ १..

विकसित सरसिज ललित मुखेन ।

स्फुटति न सा मनसिज विशिखेन ॥ २..

 

अमृत मधुर मृदुतर वचनेन ।

ज्वलति न सा मलयज पवनेन ॥ ३..

 

स्थल जलरुह रुचिकर चरणेन ।

लुठति न सा हिमकर किरणेन ॥ ४..

 

सजल जलद समुदय रुचिरेण।

दळति न सा हृदि विरह भरेण ॥५॥

 

कनक निचय रुचि शुचि वसनेन ।

श्वसिति न सा परिजनहसनेन ॥ ६..

सकल भुवन जन वर तरुणेन ।

वहति न सा रुजं अति करुणेन ॥ ७..

श्री जयदेव भणित वचनेन ।

प्रविशतु हरिरपि हृदयमनेन ॥ ८..

 

----------

मनो भवानन्दन चन्दनानिल

प्रसीद रे दक्षिण मुञ्च वामताम् ।

क्षणं जगत्प्राण निधाय माधवं

पुरो मम प्राणहरो भविष्यसि ॥ ४६..
 

रिपुरिव सखी संवासोऽयं शिखीव हिमानिलो

विषमिव सुधारश्मिः यस्मिन्धुनोति मनोगते ।

हृदयमदये तस्मिन्नेवं पुनर्वलते बलात्

कुवलयदृशां वामः कामो निकाम निरङ्कुशः ॥ ४७..

बाधां विधेहि मलयानिल पञ्चबाण

प्राणान् गृहाण न गृहं पुनराश्रयिष्ये ।

किं ते कृतान्त भगिनि क्षमया तरङ्गैः

अङ्गानि सिञ्च मम शाम्यतु देहदाहः ॥ ४८..

सान्द्रानन्द पुरन्दरादि दिविषत् बृन्दैः अमन्दादरात्

आनम्रैः मकुटेन्द्र नीलमणिभिः संदर्शितेन्दीवरम् ।

स्वच्छन्दं मकरन्द सुन्दर गळन् मन्दाकिनीमेदुरं

श्री गोविन्द पदार विन्दं अशुभ स्कन्दाय वन्दामहे ॥४॥

इति श्रीगीतगोविन्दे शृङ्गार महाकाव्ये

श्रीकृष्णदास जयदेवकृतौ

विप्रलब्धावर्णने नागरिक नारायणो नाम

सप्तमः सर्गः ॥

Shadow on Concrete Wall
17
Marble Surface
Rajani Janitha
Shadow on Concrete Wall
Raga : Arabhi
Marble Surface
Taala : Adi
JDA_17-S

अथ कथमपि यामिनीं विनीय

स्मर शर जर्झरितापि सा प्रभाते ।

अनुनय वचनं वदन्तं अग्रे

प्रणतमपि प्रियमाह साभ्यसूयम् ॥ ४९..

रजनि जनित गुरु जागर राग कषायितं अलसनिमेषम् ।

वहति नयनं अनुरागमिव स्फुटं उदितरसाभिनिवेशम् ॥ (हरिहरि)

 

याहि माधव याहि केशव मा वद कैतववादम् ।

तां अनुसर सरसीरुहलोचन या तव हरति विषादम् ॥ ५०..

कज्जल मलिन विलोचन चुम्बन विरचित नीलिम रूपम् ।

दशन वसनं अरुणं तव कृष्ण तनोति तनोरनुरूपम् ॥ (हरिहरि) २..

वपुरनुसरति तव स्मर सङ्गर कर नखरक्षत रेखम्।

मरकत शकल कलित कळ धौत लिपेरिव रतिजयलेखम् ॥(हरिहरि) ३॥

चरण कमल गळत् अलक्तक सिक्तं इदं तव हृदयमुदारम् ।

दर्शयतीव बहिर्मदन द्रुम नवकिसलय परिवारम् ॥ (हरिहरि) ४..

दशनपदं भवत अधरगतं मम जनयति चेतसि खेदम् ।

कथयति कथं अधुनापि मया सह तव वपुरेतत् अभेदम् ॥ (हरिहरि) ५..

बहिरिव मलिनतरं तव कृष्ण मनोऽपि भविष्यति नूनम् ।

कथमथ वञ्चयसे जनमनुगतं असम शर ज्वरदूनम् ॥ (हरिहरि) ६..

भ्रमति भवान् अबलाकबळाय वनेषु किमत्र विचित्रम् ।

प्रथयति पूतनिकैव वधूवध निर्दय बाल चरित्रम् ॥ (हरिहरि) ७..

श्री जयदेव भणित रति वञ्चित खण्डित युवति विलापम् ।

शृणुत सुधा मधुरं विबुधा वदतापि सुखं सुदुरापम् ॥ (हरिहरि) ८..

तवेदं पश्यन्त्याः प्रसरदनुरागं बहिरिव

प्रियापादालक्तच्छुरितं अरुणच्छाय हृदयम् ।

ममाद्य प्रख्यात प्रणय भर भङ्गेन कितव !

त्वदालोकः शोकादपि किमपि लज्जां जनयति ॥ ५०..

प्रातर्नीलनिचोळं अच्युतं उरः संवीत पीतांशुकं

राधायाश्चकितं विलोक्य हसति स्वैरं सखीमण्डले।

व्रीडा चञ्चलमञ्चलं नयनयोः आधाय राधानने

स्मेर स्मेर मुखोऽयमस्तु जगदानन्दाय नन्दात्मजः ॥
 

इति श्रीगीतगोविन्दे शृङ्गार महाकाव्ये

श्रीकृष्णदास जयदेवकृतौ

खण्डितावर्णने विलक्ष लक्ष्मीपतिर्नाम

अष्ठमस्सर्गः ॥

JDA_18-S
Shadow on Concrete Wall
18
Marble Surface
Hari Rabi Sarathi
Shadow on Concrete Wall
Raga : Yadukula kamboji
Marble Surface
Taala : Adi

तां अथ मन्मथ खिन्नां रतिरसभिन्नां विषाद सम्पन्नाम् ।

अनुचिन्तित हरि चरितां कलहान्तरितां उवाच रहसि सखी ॥ ५१..

हरिरभिसरति वहति मधुपवने ।

किमपरं अधिकसुखं सखि भवने ॥

माधवे ।

मा कुरु मानिनि मानं अये सखि ॥ १..

ताळ फलादपि गुरुं अतिसरसम् ।

किमु विफली कुरुषे कुच कलशम् ॥ (माधवे) २..

कति न कथितमिदं अनुपदं अचिरम् ।

मा परिहर हरिं अतिशय रुचिरम् ॥ (माधवे) ३..

किमिति विषीदसि रोदिषि विकला ।

विहसति युवति सभा तव सकला ॥ (माधवे) ४..

मृदु नळिनी दळ शीतळ शयने ।

हरिं अवलोकय सफलय नयने ॥ (माधवे) ५..

जनयसि मनसि किमिति गुरुखेदम् ।

शृणु मम सुवचनम् अनिहित भेदम् ॥ (माधवे) ६..

हरिरुपयातु वदतु बहु मधुरम् ।

किमिति करोषि हृदयमति विधुरम् ॥ (माधवे) ७..

श्री जयदेव भणितं अतिलळितम् ।

सुखयतु रसिक जनं हरि चरितम् ॥ (माधवे) ८..

स्निग्धे यत्परुषासि यत्प्रणमति स्तब्धासि यद्रागिणि

(द्वेषस्थासि)/(द्वेषं यासि) यदुन्मुखे विमुखतां यातासि तस्मिन्प्रिये ।

तद्युक्तं विपरीत कारिणि तव श्रीखण्ड चर्चा विषं

शीतांशुस्तपनो हिमं हुतवहः क्रीडामुदो यातनाः ॥ ५२..

अन्तर्मोहन मौळि घूर्णन मिलन् मन्दार विस्रंसन

स्तब्धाकर्षण दृष्टि हर्षण महामन्त्रः कुरङ्गीदृशाम्।

दृप्यद्दानव दूयमान दिविषत् दुर्वार दुःखापदां

भ्रंशः कंसरिपोः समर्पयतु वः श्रेयांसि वंशीरवः ॥

इति श्रीगीतगोविन्दे शृङ्गार महाकाव्ये

श्रीकृष्णदास जयदेवकृतौ

कलहान्तरितावर्णने

मन्दमुकुन्दो नाम नवमः सर्गः ॥

Shadow on Concrete Wall
19
Marble Surface
Vadasi Yadi Kinchidapi
Shadow on Concrete Wall
Raga : Mukhari
Marble Surface
Taala : Adi
JDA_19-S

अत्रान्तरे मसृण रोष वशादसीम

निःश्वास निस्सहमुखीं सुमुखीं उपेत्य ।

सव्रीडं ईक्षित सखी वदनां दिनान्ते

सानन्द गद्गद पदं हरिरित्युवाच ॥ ५३..

वदसि यदि किञ्चिदपि दन्तरुचिकौमुदी

हरतु दर तिमिरं अतिघोरम् ।

स्फुरदधर शीधवे तव वदन चन्द्रमा

रोचयतु लोचन चकोरम् ॥

 

प्रिये चारुशीले प्रिये चारुशीले ।

मुञ्च मयि मानं अनिदानं ।

सपदि मदनानलो दहति मम मानसं

देहि मुख कमल मधुपानम् ॥ (प्रिये) १..

सत्यमेवासि यदि सुदति मयि कोपिनी

देहि खरनखर शरघातम् ।

घटय भुजबन्धनं जनय रद खण्डनं

येन वा भवति सुखजातम् ॥ (प्रिये) २..

त्वमसि मम जीवनं त्वमसि मम भूषणं

त्वमसि मम भव जलधि रत्नम् ।

भवतु भवतीह मयि सततं अनुरोधिनि

तत्र मम हृदयं अतियत्नम् ॥ (प्रिये) ३..

नील नळिनाभमपि तन्वि तव लोचनं

धारयति कोकनद रूपम् ।

कुसुम शर बाण भावेन यदि रञ्जयसि

कृष्णमिदं एतत अनुरूपम् ॥ (प्रिये) ४..

स्फुरतु कुच कुम्भयोः उपरि मणि मञ्जरी

रञ्जयतु तव हृदयदेशम् ।

रसतु रशनापि तव घन जघन मण्डले

घोषयतु मन्मथ निदेशम् ॥ (प्रिये) ५..

स्थल कमल भञ्जनं मम हृदय रञ्जनं

जनित रति रङ्ग परभागम् ।

भण मसृणवाणि करवाणि चरणद्वयं

सरस सदलक्तक सरागम् ॥ (प्रिये) ६..

स्मर गरळ खण्डनं मम शिरसि मण्डनं

देहि पदपल्लवं उदारम् ।

ज्वलति मयि दारुणो मदन कदनानलो

हरतु तदुपाहित विकारम् ॥ (प्रिये) ७..

इति चटुल चाटु पटु चारु मुर वैरिणो

राधिकां अधि वचन जातम् ।

जयतु पद्मावती रमण जयदेव कवि

भारती भणितमिति गीतम् ॥ (प्रिये) ८..

परिहर कृतातङ्के शङ्कां त्वया सततं घन-

स्तन जघनयाऽऽक्रान्ते स्वान्ते परानवकाशिनि ।

विशति वितनोरन्यो धन्यो न कोऽपि ममान्तरं

स्तनभरपरीरम्भारम्भे विधेहि विधेयताम् ॥ ५४..

मुग्धे विधेहि मयि निर्दय दन्तदंश

दोर्वल्लि बन्ध निबिड स्तन पीडनानि ।

चण्डि त्वमेव मुद मञ्च न पञ्चबाण-

चण्डाल काण्ड दलनात् असवः प्रयान्तु ॥ ५५..

शशिमुखि! तव भाति भङ्गुरभ्रूः

युवजन मोह कराळ कालसर्पी ।

तदुदित भय भञ्जनाय यूनां

त्वदधर शीधु सुधैव सिद्ध मन्त्रः ॥३॥

बन्धूक ध्युति बान्धवोऽयं अधरः स्निग्धो मधूकच्चविः

गण्डश्चण्डि चकास्ति नीलनळिन श्रीमोचनं लोचनम् ।

नासान्वेति तिल प्रसून पदवीं कुन्दाभदन्ति प्रिये

प्रायः त्वन्मुखसेवया विजयते विश्वं स पुष्पायुधः ॥ ५७..

व्यथयति वृथा मौनं तन्वि प्रपञ्चय पञ्चमं

तरुणि मधुरालापैस्तापं विनोदय दृष्टिभिः ।

सुमुखि विमुखी भावं तावद्विमुञ्च न मुञ्च मां

स्वयं अतिशय स्निग्धो मुग्धे प्रियोऽयं उपस्थितः ॥ ५६..

दृशौ तव मदालसे वदनमिन्दुं अत्युन्नतं

गतिर्जन मनोरमा विधुत रम्भं ऊरुद्वयम् ।

रतिस्तव कलावती रुचिर चित्रलेखे भ्रुवौ

अहो विबुध यौवतं वहसि तन्वी पृथ्वीङ्गता ॥ ५८..

प्रीतिं वस्तनुतां हरिः कुवलयापीडेन सार्धं रणे

राधा पीनपयोधर स्मरणकृत् कुम्भेन सम्भेदवान्।

यत्र स्विद्यति मीलति क्षणमथ क्षिप्ते द्विपे तत्क्षणात्

कंसस्यालमभूत् जित्ं जितमिति व्यामोह कोलाहलः ॥७॥

इति श्रीगीतगोविन्दे शृङ्गार महाकाव्ये

श्रीकृष्णदास जयदेवकृतौ

राधा वर्णने

(मुग्ध माधवो)/(चतुरचतुर्भुजो) नाम

दशमस्सर्गः ॥

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20
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Virachitha Chatu
Shadow on Concrete Wall
Raga : Kalyani
Marble Surface
Taala : Adi
JDA_20-S

सुचिरं अनुनयेन प्रीणयित्वा मृगाक्षीं

गतवति कृतवेषे केशवे कुञ्जशय्याम् ।

रचित रुचिर भूषां दृष्टिमोषे प्रदोषे

स्फुरति निरवसादां काऽपि राधां जगाद ॥ ५९..

विरचित चाटु वचन रचनं चरणे रचित प्रणिपातम् ।

सम्प्रति मञ्जुळ वञ्जुळ सीमनि केळि शयनं उपयातम् ॥

 

मुग्धे मधुमथनं हे राधे ।

अनुगतं अनुसर राधे राधे ॥ १..

 

घन जघन स्तन भार भरे दर मन्थर चरण विहारम् ।

मुखरित मणि मञ्जीरमुपैहि विधेहि मराळ विकारम् ॥ (राधे) २..

शृणु रमणीयतरं तरुणीजन मोहन मधुप विरावम् ।

कुसुम शरासन शासन वन्दिनि पिक निकरे भज भावम् ॥ (राधे) ३..

अनिल तरल किसलय निकरेण करेण लता निकुरम्बम् ।

प्रेरणमिव करभोरु करोति गतिं प्रतिमुञ्च विलम्बम् ॥ (राधे) ४..

स्फुरितं अनङ्ग तरङ्ग वशादिव सूचित हरि परिरम्भम् ।

पृच्छ मनोहर हार विमल जलधारं अमुं कुचकुम्भम् ॥ (राधे) ५..

अधिगतं अखिल सखीभिरिदं तव वपुरपि रतिरण सज्जम् ।

चण्डिरसित रशनारव डिण्डिमं अभिसर सरसं अलज्जम् ॥ (राधे) ६..

 

स्मरशर सुभग नखेन सखीं अवलम्ब्य करेण सलीलम् ।

चल वलय क्वणितैः अवबोधय हरिमपि निजगति शीलम् ॥ (राधे) ७..

श्री जयदेव भणितं अधरीकृत हारं उदासित वामम् ।

हरि विनिहित मनसां अधि तिष्ठतु कण्ठतटीं अविरामम् ॥ (राधे) ८..

सा मां द्रक्ष्यति वक्ष्यति स्मरकथाः प्रत्यङ्गं आलिङ्गनैः

प्रीतिं यास्यति रम्स्यते सखि समागत्येति चिन्ताकुलः ।

स त्वां पश्यति वेपते पुलकयत्यानन्दति स्विद्यति

प्रत्युद्गच्छति मूर्च्छति स्थिरतमः पुञ्जे निकुञ्जे प्रियः ॥ ६०..

अक्ष्णोर्निक्षिपदञ्जनं श्रवण्योस्तापिच्छगुच्छावलिं

मूर्ध्नि श्याम सरोज दाम कुचयोः कस्तूरिका पत्रकम्।

धूर्तानां अभिसार साहसकृतां विष्वङ्निकुञ्जे सखि!

ध्वान्तं नीलनिचोळ चारुसुदृशां प्रत्यङ्गमालिङ्गति ॥ ६१..

काश्मीर गौर वपुषां अभिसारिकाणाम्

आबद्धरेखं अभितो रुचि मञ्जरीभिः ।

एतत्तमालदळ नीलतमं तमिस्रं

तत्प्रेम हेम निकषोपलतां तनोति ॥ ६२..

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21
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Manjuthara Kunja
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Raga : Ghanta
Marble Surface
Taala : Adi
JDA_21-S

हारावली तरळ काञ्चन काञ्चिदाम

मञ्जीर कङ्कण मणिध्युति दीपितस्य ।

द्वारे निकुञ्ज निलयस्य हरिं निरीक्ष्य

व्रीडावतीं अथ सखी निजगाद राधाम् ॥ ६३..

मञ्जुतर कुञ्जतल केळिसदने ।

इह विलस रति रभस हसितवदने ॥

 

प्रविश राधे माधवसमीपं ।

कुरु मुरारे मङ्गलशतानि ॥ १..

नव भवदशोकदळ शयनसारे ।

इह विलस कुच कलश तरळ हारे ॥ २..

चल मलय वन पवन सुरभि शीते ।

इह विलस रस वलित ललितगीते ॥ ४..

कुसुम चय रचित शुचि वास गेहे ।

इह विलस कुसुम सुकुमार देहे ॥ ३..

मधु तरळ पिक निकर निनद मुखरे ।

इह विलस दशन रुचि रुचिर शिखरे ॥ ६..

वितत बहु वल्लि नव पल्लव घने।

इह विलस पीन कुच कुम्भ जघने ॥५॥

मधु मुदित मधुप कुल कलितरावे ।

इह विलस मदन शर रभस भावे ॥ ५..

विहित पद्मावती सुख समाजे ।

भणति जयदेव कवि राज राजे ॥ ८..

त्वां चित्तेन चिरं वहन् अयं अतिश्रान्तो भृशं तापितः

कन्दर्पेण तु पातुमिच्छति सुधा संबाध बिम्बाधरम् ।

अस्याङ्गं तदलङ्कुरु क्षणमिह भ्रूक्षेपलक्ष्मीलव

क्रीते दास इवोपसेवित पदाम्भोजे कुतः सम्भ्रमः ॥ ६४..

JDA_22-S
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22
Marble Surface
Radha vadana vilokana
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Raga : Madhyamavathi
Marble Surface
Taala : Adi

सा स साध्वस सानन्दं गोविन्दे लोललोचना ।

सिञ्जान मञ्जु मञ्जीरं प्रविवेश निवेशनम् ॥ ६५..

राधा वदन विलोकन विकसित विविध विकार विभङ्गम् ।

जलनिधिमिव विधुमण्डल दर्शन तरळित तुङ्ग तरङ्गम् ॥

 

हरिं एकरसम् ।

चिरमभिलषितविलासं ।

सा ददार्श गुरु हर्ष वशंवद वदनमनङ्ग विकासम् ॥ १..

हारममलतर तारमुरसि दधतं परि(लम्ब्य)/(रभ्य) विदूरम् ।

स्फुटतर फेन कदम्ब करम्बितं इव यमुनाजलपूरम् ॥ २..

श्यामळ मृदुळ कलेबर मण्डलं अधिगत गौर दुकूलम् ।

नील नळिनमिव पीतपराग पटल भर वलयित मूलम् ॥ ३..

तरल दृगञ्चल चलन मनोहर वदन जनित रति रागम् ।

स्फुट कमलोदर खेलित खञ्जन युगमिव शरदि तडागम् ॥ ४..

वदन कमल परिशीलन मिळित मिहिर सम कुण्डल शोभम् ।

स्मित रुचि रुचिर समुल्ल सिताधर पल्लव कृत रति लोभम् ॥ ५..

शशि किरणच्छुरितोदर जलधर सुन्दर कुसुम सुकेशम् ।

तिमिरोदित विधु मण्डल निर्मल मलयज तिलक निवेशम् ॥ ६..

विपुल पुलकभर दन्तुरितं रतिकेळि कलाभिरधीरम् ।

मणि गण किरण समूह समुज्ज्वल भूषण सुभग शरीरम् ॥ ७..

श्री जयदेव भणित विभव द्विगुणीकृत भूषण भारम् ।

प्रणमत हृदि विनिधाय हरिं रुचिरं सुकृतोदयसारम् ॥ ८..

अतिक्रम्यापाङ्गं श्रवणपथ पर्यन्त गमन

प्रयासेनेवाक्ष्णोः तरळ तर भावं गमितयोः ।

इदानीं राधायाः प्रियतम समालोक समये

पपात स्वेदाम्बु प्रसर इव हर्षाश्रुनिकरः ॥ ६६..

भजन्त्याः तल्पान्तं कृत कपट कण्डूति विहित-

स्मिते याते गेहात् बहिरपि हिताळी परिजने ।

प्रियास्यं पश्यन्त्याः स्मरशरसमाकूतसुभगं

सलज्जा लज्जापि व्यगमदिव दूरं मृगदृशः ॥ ६७..

जयश्री विन्यस्तैः महित इव मन्दारकुसुमैः

स्वयं सिन्दूरेण द्विपरण मुदा मुद्रित इव।

भुजापीड क्रीडाहत कुवलया पीड करिणः

प्रकीर्णासृग्बिन्दुः जयति भुजदण्डो मुरजितः ॥१०॥

इति श्रीगीतगोविन्दे शृङ्गार महाकाव्ये

श्रीकृष्णदास जयदेवकृतौ

सानन्द गोविन्दो नाम

एकादश सर्गः ॥

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23
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Kisalayashayana Kurukamiti
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Raga : Naadanama kriya
Marble Surface
Taala : Adi
JDA_23-S

गतवति सखीबृन्देऽमन्दत्रपाभर निर्भर

स्मर परवशाकूत स्फीत स्मित स्नपिताधराम् ।

सरसमलसं दृष्ट्वा तुष्टां मुहुर्नव पल्लव

प्रसव शयने निक्षिप्ताक्षीं उवाच हरिः प्रियाम् ॥ ६८..

किसलयशयनतले कुरु कामिनि चरणनलिनविनिवेशम् ।

तव पद पल्लव वैरि पराभवं इदं अनुभवतु सुवेशम् ॥

 

क्षणमधुना नारायणम् ।

अनुगतं अनुभज राधे ॥ (राधे) १..

करकमलेन करोमि चरणमहं आगमितासि विदूरम् ।

क्षणमुपकुरु शयनोपरि मामिव नूपुरमनुगति शूरम् ॥ (राधे) २..

वदन सुधानिधि गळितममृतमिव रचय वचनं अनुकूलम् ।

विरहमिवापनयामि पयोधर रोधकमुरसि दुकूलम् ॥ (राधे) ३..

प्रिय परिरम्भण रभस वलितमिव पुळकितमति दुरवापम् ।

मदुरसि कुचकलशं विनिवेशय शोषय मनसिज तापम् ॥ (राधे) ४..

अधर सुधारसं उपनय भाविनि जीवय मृतमिव दासम् ।

त्वयि विनिहित मनसं विरहानल दग्ध वपुषं अविलासम् ॥ (राधे) ५..

शशिमुखि मुखरय मणिरशनागुणं अनुगुण कण्ठ निनादम् ।

श्रुति युगळे पिकरुत विकले मम शमय चिरादवसादम् ॥ (राधे) ६..

मामपि विफलरुषा विकलीकृतं अवलोकितं अधुनेदम् ।

मीलित लज्जितमिव नयनं तव विरम विसृज रतिखेदम्

॥ (राधे) ७..

श्री जयदेव भणितमिदं अनुपद निगदित मधुरिपु मोदम् ।

जनयतु रसिक जनेषु मनोरम रतिरस भाव विनोदम् ॥ (राधे) ८..

 

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प्रत्यूहः पुलकांकुरेण निबिडाश्लेषे निमेषेण च

क्रीडाकूत विलोकनेऽधरसुधापाने कथा नर्मभिः ।

आनन्दाधिगमेन मन्मथ कलायुद्धोऽपि यस्मिन्नभूत्

उद्भूतः तयोर्बभूव सुरतारम्भः प्रियं भावुकः॥१॥

दोर्भ्यां संयमितः पयोधरभरेणापीडितः पाणिजैः

आविद्धो दशनैः क्षताधरपुटः श्रोणीतटेनाहतः।

हस्तेनानमितः कचेऽधर सुधास्वादेन सम्मोहितः

कान्तः कामपि तृप्तिमाप तदहो कामस्य वामागतिः ॥२॥

माराङ्के रतिकेळि सङ्कुलरणारम्भे तया साहस

प्रायं कान्तजयाय किञ्चिदुपरि प्रारम्भि यत्सम्भ्रमात् ।

निष्पन्दा जघनस्थली शिथिलता दोर्वल्लिरुत्कम्पितं

वक्षो मीलितमक्षि पौरुषरसः स्त्रीणां कुतः सिध्यति ॥ ६९..

व्यालोलः केशपाशस्तरळितमळकैः स्वेदलोलौ कपोलौ

दष्टा बिम्बाधरश्रीः कुचकलशरुचा हारिता हारयष्टिः।

काञ्ची काञ्चिद्गताशां स्तनजघनपदं पाणिनाच्छाद्य सद्यः

पश्यन्ती सत्रपं मां तदपि विलुळित स्रग्धरेयं धिनोति ॥६॥

ईषन्मीलित दृष्टि मुग्ध हसितं सीत्कार धारावशात्-

अव्यक्ताकुल केळिकाकु विलसद्दन्तांशुधौताधरम्।

श्वासोत्तप्त पयोधरोपरि परिष्वङ्गी कुरङ्गीदृशो

हर्षोत्कर्षविमुक्ति निस्सहतनोः घन्यो धयत्याननम् ॥७॥

तस्याः पाटलपाणिजाङ्कितमुरो निद्राकषाये दृशौ

निर्धूतोधरशोणिमा विलुळित स्रस्तस्रजो मूर्द्धजाः।

काञ्ची दामदर श्लथाञ्चलमिति प्रातर्निखातैर्दृशोः

एभिः कामशरैः तदद्भुतमभूत् पत्युर्मनः कीलितम् ॥४॥

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24
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Kuru Yadunandana
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Raga : Surutti
Marble Surface
Taala : Adi
JDA_24-S

अथ कान्तं रति श्रान्तं अभिमण्डन वाञ्छया ।

जगाद माधवम् राधा मुग्धा स्वाधीन भर्तृका ॥ ७०..

कुरु यदुनन्दन चन्दन शिशिर तरेण करेण पयोधरे ।

मृगमद पत्रकं अत्र मनोभव मङ्गळ कलश सहोदरे ॥

 

निजगाद सा यदुनन्दने क्रीडति हृदयानन्दने ।

नन्दनन्दने भक्त चन्दने ॥ १..

अळिकुल भञ्जनमञ्जनकं रति नायक सायकमोचने ।

त्वदधर चुम्बन लम्बित कज्जलं उज्ज्वलय प्रिय लोचने ॥ २..

नयन कुरङ्ग तरङ्ग विकास निरासकरे श्रुतिमण्डले ।

मनसिज पाश विलासधरे सुभगे विनिवेशय कुण्डले ॥ ३..

भ्रमरचयं रचयन्तमुपरि रुचिरं सुचिरं मम सम्मुखे ।

जितकमले विमले परिकर्मय नर्मजनकमळकं मुखे ॥ ४..

मृगमद रसवलितं ललितं कुरु तिलकमळिकरजनीकरे ।

विहित कलङ्क कळं कमलानन विश्रमितश्रमशीकरे ॥ ५..

घनरुचिरे चिकुरे कुरु मानद मानसज ध्वज चामरे ।

रतिगळिते लळिते कुसुमानि शिखण्डि शिखण्डक डामरे ॥ ६..

सरसघने जघने मम शम्बर दारण वारण कन्दरे ।

मणिरशना वसनाभरणानि शुभाशय वासय सुन्दरे ॥ ७..

श्री जयदेव रुचिर वचने हृदयं सदयं कुरु मण्डने ।

हरिचरण स्मरणामृत निर्मित कलिकलुष ज्वर खण्डने ॥ ८..

रचय कुचयोः पत्रं चित्रं कुरुष्व कपोलयोः

घटय जघने काञ्चीमञ्चस्रजं कबरीभररे ।

कलय वलय श्रेणीं पाणौ पदे कुरु नूपुरौ

इति निगदितः प्रीतः पीताम्बरोऽपि तथाकरोत् ॥ ७१..

पर्यङ्कीकृत नागनायक फणा श्रेणी मणीनां गणे

सङ्क्रांत प्रतिबिम्ब संवलनया बिभ्रद्विभु प्रक्रियाम्।

पादांभोरुह धारि वारिधि सुतामक्ष्णां दिदृक्षुः शतैः

कायव्यूहमिवाचरन्नुपचितीभूतो हरिः पातु नः ॥२॥

त्वामप्राप्य मयि स्वयंवरपरां क्षीरोद तीरोदरे

शङ्के सुन्दरि! कालकूटमपिबत् मन्दो मृडानीपतिः।

इत्थं पूर्वकथाभिरन्यमनसः विक्षिप्य वक्षोऽञ्चलं

राधायाः स्तनकोरकोपरि मिळन्नेत्रो हरिः पातु नः ॥५॥

यद्गान्धर्व कलासु कौशलं अनुध्यानं च यद्वैष्णवं

यच्छृङ्गार विवेक तत्वमपि यत्काव्येषु लीलायितम् ।

तत्सर्वं जयदेव पण्डित कवेः कृष्णैकतानात्मनः

सानन्दाः परिशोधयन्तु सुधियः श्रीगीतगोविन्दतः ॥ ७२..

यन्नित्यैर्वचनैः विरिञ्चि गिरिजा प्राणेश मुख्यैः मुहुः

नानाकार विचार सार चतुरैः नाद्यापि निश्चीयते ।

तद्भव्यैः जयदेव काव्यघटितैः सत्सूक्ति संशोधितैः

आद्यं वस्तु चकास्तु चेतसि परं सारस्य सीमाजुषाम् ॥

साध्वी माध्वीकचिन्ता न भवति भवतः शर्करे कर्कशासि

द्राक्षे द्रक्ष्यन्ति के त्वां अमृत मृतमसि क्षीर नीरं रसस्ते।

माकन्द क्रन्द कान्ताधर धरणितलं गच्छ यच्छान्ति भावं

यावच्छृङ्गारसारस्वतमिह जयदेवस्य विष्वग्वचांसि ॥४॥

इति श्रीगीतगोविन्दे शृङ्गार महाकाव्ये

श्रीकृष्णदास जयदेवकृतौ

स्वाधीन भर्तृका वर्णने

सुप्रीतपीताम्बरो नाम

द्वादशः सर्गः ..

 

.. इति गीतगोविन्दं समाप्तम् ..

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